कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू।
सकल कला सब बिद्या हीनू ।।
मैं न तो कवि हूँ ओर न ही बोलने में प्रवीण (कुशल) हूँ । मैं सभी कलाओं और सब प्रकार की विद्या से भी हीन हूँ । आओ एक ऐसा समाज बनाएं जहाँ हर मनुष्य, मनुष्य धर्म का पालन करे। न केवल मानवों का जीवन खुशहाल बने अपितु सभी जीव-जंतु स्वतंत्र होकर अपना जीवन जिएँ। मानवों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का बिना सोचे-समझे दोहन किया जा रहा है, जिससे विलासिता और प्राकृतिक अपदाएं बढ़ती जा रही हैं।
let's learn to live life!